रचनाकार

लद्युकथा : वो माँ कभी विधवा नहीं होती

शब्द मसीहा केदारनाथ…

अस्पताल में वह काउंटर पर पेमेंट जमा करा रहा था कि उसकी पत्नी का फोन आया, “अरे! ये क्या कर रहे हो तुम , इतना खर्चा हो रहा है। कम से कम मुझसे बात तो करते। अपने बच्चों के भविष्य का भी तो कुछ सोचो।”

“क्या हुआ ?” पति ने पूछा।

“आज तुमने फिर इतने पैसे निकाल लिए अकाउंट से।” पत्नी ने कहा।

“तो क्या हुआ, भाई है मेरा ।” पति ने जवाब दिया।

“वो तो ठीक है , लेकिन जानते हो पंद्रह लाख से ज्यादा खर्च हो चुके हैं, फिर उसकी पत्नी भी तो काम करती है ….वो कुछ क्यों नहीं करती? अपने माँ-बाप से भी तो अपने पति के इलाज के लिए पैसे मँगवा सकती है । सारी ज़िम्मेदारी उठाने का ठेका क्या हमने ले रखा है ?” पत्नी ने आगा पीछा समझाते हुए कहा।

“हाँ, तुम कह तो ठीक रही हो, अक्ल और चालाकी तो यही तकाजा करती है….पर तुम एक बात भूल रही हो कि तुम्हारे ऑपरेशन में भी मैंने एक पैसा नहीं लिया था । छोटी बहू के पिता जी को मैंने आश्वासन दिया था कि उसे बेटी बनाकर ले जा रहा हूँ ….. अब मैं उस बेटी का सुहाग बचा रहा हूँ सिर्फ भाई नहीं।” पति ने कहा।

पीछे खड़ी माँ ने अपने आँसू पोंछते हुए पर्स खोला और सूने माथे पर बिंदी लगा ली और बोली , “जिसकी औलाद अपने बाप से दो हाथ आगे निकल जाय वो माँ कभी विधवा नहीं होती।” और बेटे के सिर पर स्नेह का हाथ रख दिया।

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