फीकी खिचड़ी -मीठा प्यार
“बेटा ! आज बाहर से खाना ले आओ . मेरे लिए मत लाना , बस दोनों भाई जो खाओ सो ले आना.” बेड पर बुखार और पीड़ा से कराहती वीणा ने कहा.
“माँ ! आज हम कुछ भी खा लेंगे . आपके लिए चाय बना दूँ . लगता है दवा का असर नहीं हुआ अभी .” बेटा बोला .
“अरे! नहीं , कुछ तो खा लो . सुबह तक आराम हो जाएगा . चाय बना ले बेटा . तेरी बहिन होती तो इतनी तकलीफ नहीं होती तुम्हें …पर तेरी दादी को तो वंश का नाम ही चाहिए था .”
मृणाल ने फटाफट चाय बनाना शुरू कर दिया . कानों में मोबाइल की लीड लगाईं . चावल, दाल , भिगो दिया . चाय पीना अभी ख़त्म भी न था कि रसोई से कुकर की सीटी की आवाज आई .
“मृणाल ! सीटी कैसे आ रही बेटा ?” माँ ने पूछा .
“मैं आपकी बेटी बनने की कोशिश कर रहा हूँ इस गूगल बाबा के साथ . आज मैं खिचड़ी पका रहा हूँ . कोई बाहर का खाना नहीं चाहिए .”
हुछ देर बाद जब माँ को चाय पिला दी तो बर्तन उठाकर मृणाल रसोई में आ गया और बर्तन मांझने लगा . माँ समझ चुकी थी कि बेटा आज माँ का काम कर रहा है . बर्तन सुबह से ही रखे हुए थे अतः थोड़ी देर लग गई .
“सुनीत भाई ! नीचे आ जाओ . खाना तैयार है .” और मृणाल ने तीन जगह खिचड़ी डाल दी . मगर यह क्या…. बहुत पतली-पतली थी खिचड़ी .
“माँ ! जरा सी चख लो . बताओ कैसी बनाई है मैंने खिचड़ी?” माँ के सामने खिचड़ी रखते हुए मृणाल बोला .
माँ ने खिचड़ी को देखा और थोडा सा मुस्कुराई . फिर हाथ में चम्मच ले थोड़ी सी खिचड़ी खाई .
“इतनी अच्छी तो मैं भी नहीं बनाती . बहुत स्वाद बनी है.”
मृणाल ने जैसे ही खिचड़ी का चम्मच मुँह में डाला तो पता चल गया कि नमक बहुत कम है .
“सॉरी माँ ! नमक कम हो गया है .” मृणाल बोला .
“तू अचार से खा ले अच्छा लगेगा . मेरा तो काम ऐसे ही चल जाएगा . अब कल क्या बनाएगा ?” माँ ने मुस्कुराते हुए पूछा .
“पनीर भुजिया विद ब्राउन ब्रेड …हा हा हा …वो तो पक्का अच्छा बनेगा . वैसे माँ क्या मैं सचमुच तुम्हारी बेटी नहीं बन सकता क्या ?”
माँ ने मृणाल के सिर पे हाथ फेरा और बोली -“जब तक दाढ़ी मूंछ नहीं आतीं हर बेटा , बेटी ही होता है . अब तू बेटी ही है . जा बर्तन साफ़ कर ले ….पास हो गया तू .” और आँखें डबडबा कर रह गईं.
शब्द मसीहा

