मिसाल-ए-मऊ

मऊ के अंशुमान गोबर से बना रहे हैं मूर्ति और दीपक, न्यूज़ीलैंड तक है मांग

( अजीत राज राय / आनन्द कुमार )

संस्कृति, सभ्यता और परम्परा का अगर हर आंगन से रिश्ता होता है तो उसमें गाय के गोबर की महत्ता कम नहीं है। खैर शहरों में और कुछ-कुछ गांवों में घरो का स्वरूप बदलने से यह परम्परा शहर से तो लुप्त सी हो गयी है। गांवों में भी अब विवाहोत्सव, पूजा पाठ आदि में गौरी गणेश पूजन तक गाय के गोबर का प्रयोग सीमित हो गया है।
गांव के कच्चे घरों में शुद्धिकरण के लिहाज से आज भी गोबर का प्रयोग नित्य होता रहता है। पूजा पाठ में पंचगव्य के रूप में जो विशेष प्रसाद बनता है वह गाय के गोबर गोमूत्र से ही तैयार किया जाता है।
अगर लुप्त होती इस परम्परा की संस्कृति को बचाने, संवारने व संजोने का नवीन प्रयोग से कोई युवा महिलाओं की टोली के साथ नई पहचान व व्यवसायिक गति विधि के तहत जनजागरण कार्य कोई कर रहा है तो उसकी खुलेमन से जरूर तारीफ होनी चाहिए।

मऊ जनपद के मादी सिपाह निवासी अंशुमान राय ने जब कुछ अलग करने को ठानी तो उसी राह पर मन में कुछ अलग स्वप्न लिए चल दिया। पहले तो उन्होंने यह प्रयोग स्वयं किया और जैसे ही प्रयोग को उम्मीद की मदद मिलने लगी तो मन का प्रसन्न होना लाजिमी है। अंशुमान ने गांव की महिलाएं जूही, आशा, पूनम, सुधीरा, सोनम, मनिता, शीला, मंशा, गुड्डी, मुनिया, सुनिता, आशा देवी, रेशमी, मुन्नी, तारा व लीला के साथ मिलकर अपने सपनों को पंख देने की शुरुआत कर दी।

देशी गाय का गोबर और गोमूत्र भी उतना ही हितकारी है जितना कि उसका दूध दही घी। बावजूद इसके हम इसके उपयोग के प्रति उदासीन होते चले जा रहे हैं।
इस उदासीनता को तोड़कर इसके महत्व का बोध कराने का वीणा अंजू स्वयं सेवा समूह ने उठाया है। इस पहल का जोरदार स्वागत होना चाहिए पर अभी ऐसा नहीं हो पा रहा है। इस समूह महिलाओं की भागीदारी विशेष है। जो भी हो पर समूह का नेतृत्व करने वाले सुशिक्षित प्रतिभाशाली युवा अंशुमान राय का हौसला बुलंद है।
दो दर्जन महिलाओं वाला यह समूह खेत खलिहान और सिवान में घास चरने वाली देशी गायों के गोबर और गोमूत्र को संकलित कर उससे लक्ष्मी गणेश जी की मूर्ति तैयार की जाने लगी है।
टीम का नेतृत्व कर रहे अंशुमान राय बताते हैं कि पशुपालकों से संकलित कर गोबर को सुखाया जाता है। ताकि उसको उचित तरीके से पीसा जा सके।

मूर्ति को तैयार करने का इनका तरीका सनातनी है। अंशुमान बताते हैं कि मूर्ति को तैयार करने के लिए गोबर को सुखा के पीसा जाता है और फिर गोबर में गंगाजल और अन्य जड़ी बूटी मिला के सांचे की सहायता से बनाया जाता है उसके पश्चात 10 से 12 दिन मूर्तियों के सूखने और रंगने में लग जाता है और इस तरह मूर्तियां तैयार होती हैं।
इन मूर्तियों का मार्केट मूल्य 300 रुपये से लेके 500 रूपये तक निर्धारित किया गया है, जबकि दीपक 2 रूपये से 25 रूपये तक के हैं। इन मूर्तियों की मांग अपने यहां से ज्यादा अन्य प्रांतों में हैं।
तैयार मूर्तियां महाराष्ट्र, दिल्ली, वाराणसी, तमिलनाडु और न्यूजीलैंड भेजी जाती हैं। कुछ मूर्तियां आजमगढ़ और मऊ में भी बिकती हैं। दशहरा और दीपावली त्योहार के मद्देनजर अन्य प्रदेशों से बढ़ती मांग के मद्देनजर समूह ने अपनी सक्रियता को बढ़ा दिया है।

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