पुण्य स्मरण

अब न कोई “राजा बाबू” है, न “बाबू मदन सिंह”—बस उनकी यादें ही शेष हैं।

@ आनन्द कुमार

कहने को तो शब्द बहुत हैं, पर क्या कहूँ! आप चाहें तो ज़िंदगी अपने तरीके से जी सकते थे, लेकिन आपने सादगी का रास्ता चुना। यश, वैभव—क्या नहीं था आपके पास! लोगों की पुकार में आप “राजा बाबू” बने रहे, लेकिन कभी भी राजा की तरह नहीं, बल्कि एक साधारण इंसान की तरह पेश आए।

देखने को तो आपको लगभग 40 वर्षों से देख रहा हूँ, लेकिन 34 साल से आपको समझने लगा, आपको जानने लगा। हमारी आपकी भेंट भले ही मकान मालिक और किरायेदार के रूप में हुई, लेकिन मैं आपके सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक व्यक्तित्व को लगातार देखता और समझता रहा हूँ।

आपके दोनों बेटे—मंटू और लख्खू—के साथ, अरविन्द चाचा, बाला भइया, पप्पू भइया—पूरे परिवार के करीब रहा। लेकिन सबसे ज्यादा बातचीत या तो रामेन्द्र प्रताप नारायण सिंह से हुई या फिर आपसे, और आपसे भी अधिकतर राजनीतिक या सामाजिक विषयों पर।

सामाजिक मुद्दों की बात करूँ तो मुझे आज भी याद है, जब मैंने आपसे पहली बार पूछा था—“चाचा, आप कार क्यों नहीं ले लेते?” तब आपने कुछ देर सोचकर कहा—“कार से चलेंगे तो इन रिक्शा वालों के साथ कौन जाएगा!” फिर आपने विस्तार से पूरी बात बताई। मैंने उस समय कुछ नहीं कहा, लेकिन आपकी सोच को मन ही मन सलाम किया।

आप ऐसे परिवार से आते थे, जो न सिर्फ जनपद बल्कि आसपास के जिलों के लिए भी गौरव का विषय है। उस परिवार का होने पर आपको गर्व तो था, लेकिन ज़रा भी गुरूर नहीं।

मेरी आपसे पहली राजनीतिक चर्चा भाजपा के सदर प्रत्याशी मुख्तार अब्बास नकवी को लेकर हुई थी, और आपकी बात बिल्कुल सही साबित हुई।

आप लाल सलाम वाले दल को छोड़कर भाजपा में आए—यह तो सही है, लेकिन तन से भाजपा में होते हुए भी मन से वामपंथी थे—ऐसा मुझे हमेशा लगता था, और यह बात आपके शोक सभा में भी आपके अपनों द्वारा कही गई, जो सच साबित हुई।

यहाँ एक बात अवश्य कहूँगा कि मऊ भाजपा के लोगों ने आपकी राजनीतिक समझ की क़ीमत नहीं समझी, नहीं तो भाजपा मऊ में इतनी कमज़ोर नहीं रहती। खैर, इसमें आप कर भी क्या सकते थे!

मुझे यह भी पता है कि आपने कितनों को विधायक, सांसद और अन्य राजनीतिक पदों तक पहुँचने की राह दिखाई, और वे सफल भी हुए, लेकिन आपने कभी अपने लिए प्रयास नहीं किया। यह भी पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि अगर आपको भाजपा से टिकट मिलता, तो कुछ मुस्लिम वोट भी आपको मिलते—और वह किसी अन्य भाजपाई से अधिक होते।

मेरी आपसे दूसरी राजनीतिक बहस विकास पुरुष कल्पनाथ राय के निधन के बाद उनके बेटे सिद्धार्थ राय के चुनाव को लेकर हुई थी। उस समय आप भाजपा में थे और पूरी निष्ठा से उसके साथ खड़े रहे।

मैंने आपसे पूछा—“चाचा, कौन जीतेगा?” आपने बिना झिझक सिद्धार्थ राय का नाम लिया। मैंने कहा—“नहीं, इस बार बसपा के बालकृष्ण चौहान जीतेंगे।” आप अपने मत पर अडिग रहे और मैं अपने पर। बात बाज़ी तक पहुँच गई, लेकिन मैं पीछे हट गया, क्योंकि अगर आप जीतते तो मैं पैसे कहाँ से लाता!

इस प्रसंग का उद्देश्य यह बताना है कि आपने जब भाजपा का दामन थामा, तब हर चुनाव में सिर्फ उसकी जीत की ही बात की, हार की नहीं।

आपके जीवन से जुड़ी और भी कई किवदंतियाँ हैं। आपने असंख्य लोगों का भला किया—संख्या शायद मऊ में सबसे अधिक होगी। कुछ लोगों को आपसे शिकायत भी रही हो—यह संभव है, मुझे नहीं पता।

लेकिन मेरी नज़र में आप आज भी लख्खू भइया के पापा ही हैं—भले ही आप दोनों आज हमारे बीच नहीं हैं।

आपके सामाजिक और राजनीतिक योगदान के साथ-साथ धार्मिक आस्था और खेल के प्रति आपका समर्पण भी अतुलनीय था—उस दृष्टि से आप सच में समंदर थे।

आपके दोनों बेटों का असमय निधन आपको भीतर से तोड़ गया, लेकिन आपने उस दर्द को अपने अंदर समेटे रखा। फिर पत्नी के जाने के बाद जैसे आपने जीवन की आशा ही खो दी और एक दिन चुपचाप दूर चले गए।

अब न कोई “राजा बाबू” है, न “बाबू मदन सिंह”—बस उनकी यादें ही शेष हैं।

सादर नमन 🙏

 

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