फिर आपके नसीब में, ये बात हो न हो..शायद फिर इस जनम में, मुलाक़ात हो न हो…”
◆ Happy birthday साधना…

( ओमा The अक्© )
“उसकी पेशानी आसमान की तरह चौड़ी और उठी हुई थी..सो उसने उस पर अपने गेशुओं के गुच्छे बादलों की तरह ऐसे बिखरा दिए ..कि उसका चेहरा भादो के बदराए-सूरज सा खिलने लगा.. “नैनो में बदरा लिए”..ये पेशानी / ये माथा एक मासूम हँसी और गज़ब की चंचल आँखों वाली साधना का था..जो इसी भादो के महीने में पैदा हुईं… साधना भारतीय सिनेमा की एक ऐसी सफलतम अभिनेत्री का नाम है..जिसकी सफलता की तुलना क्रिकेट के महारथी सर डॉन ब्रेडमैन से की जा सकती है.. हाँ ! “लव इन शिमला” की अपार सफलता से ले कर “अनीता”.. तक साधना ने लगभग सभी फिल्मो को सफल होते देखा… वो हमेशा टॉप पर रहीं.. दर्शक उन्हें हर बार देख कर रोमंचित हो जाते और कहते…” अभी न जाओ छोड़ कर/ की दिल अभी भरा नहीं.”.. जब साधना सिनेमा में आईं तब हिंदी सिनेमा का सुनहला ज़माना था.. एक से एक कलाकार..महान अभिनेत्रियां.. मधुबाला,मीना कुमारी, नर्गिश, वैजयंतीमाला या वहीदा रहमान, नूतन, निम्मी, श्यामा और चंचल आशा पारीख… इन अभिनेत्रियों ने अदाकारी और खूबसूरती का ईतिहास लिखा… एक अनचाही प्रतियोगिता साधना के सामने थी… मग़र ईतिहास बताता है कि साधना की “अभिनय साधना” उन्हें सफलता के देवत्व तक ले आई…और स्थापित कर दिया…
साधना ने “लव इन शिमला”, “हम दोनों”, “गबन”, “दूल्हा दुल्हन”, “एक मुसाफ़िर एक हसीना”, “वक़्त”, “मेरे महबूब” “मेरा साया” , “इश्क़ पर ज़ोर नहीं” , “इंतिकाम”, “एक फूल दो माली” और “अनीता” जैसी भारतीय सिनेमा की अविस्मरणीय फिल्मो में अतुलनीय अभिनय और सौदर्य से सजाया… ये सभी फिल्मे उनके इर्द गिर्द ही घूमती हैं…
साधना सिर्फ अभिनय या सौन्दर्य की नहीं बल्कि सिनेमा जगत में फैशन का प्रतिमान रहीं हैं.. उनका साधना कट तो विश्वव्यपि हुआ.. साथ ही कश्मीरी कुर्ते, कुर्ती, कढ़ाईदार जूती, जुड़े और दुपट्टे का स्टाइल..और सोफिया लॉरेन जैसे आँखों में काजल… सब अभिज्यात-महिलाओं में अनुकरणीय बन गए… किसी महिला को साधना कह कर बुला देना ही उसकी प्रशंसा का श्रष्ठ माध्यम था…
साधना का कॅरियर जितना उन्नत था …उनके स्वास्थ्य ने उन्हें उतना ही सताया.. करियर के शिखर पर उन्हें लकवे से (चेहरे पर) जूझना पड़ा… जिसने उनकी सुन्दरता को बहुत प्रभावित किया.. जल्द ही साधना ने सन्यास ले कर गुमनाम जीवन जीना शुरू कर दिया… वो कहीं नज़र नहीं आती थीं… बरसों बाद एक खबर में नज़र आईं तो वो भी ऐसी हालत में कि सिनेमा प्रेमियों के दिल कह उठे… अगर ये साधना है.. तो..”वो कौन थी”…. जिस्म और समाज के कैंसर से झुझती साधना एक दिन चुपचाप चलीं गईं… मीडिया में शोर उठा.. लेकिन उनकी अर्थी के पास बस उनकी प्यारी सहेली आशा पारेख, शाइरा बानो ,वहीदा रहमान और कुछ एक लोग… बस.. वो उठाई गईं… और चिता में रख दी गईं…बेआवाज़ जलने के लिए… जैसे हवन की कोई सुखी लकड़ी…
हाँ साधना भी सिनेमा के यज्ञ कुंड में गिरी ऐसी एक चन्दन की लकड़ी थी..जिसने जलने के बाद भी अपनी सुगन्धित भभूत सिनेप्रेमियों के माथे पर तिलक के लिए छोड़ दी है…
आज उनके जन्म दिन पर उन्हें की अदाकारी में गाया गीत याद आता है…. “फिर आपके नसीब में, ये बात हो न हो..शायद फिर इस जनम में, मुलाक़ात हो न हो…”
सप्रेम—
ओमा The अक्©
2 sep 2016
