सम्पादकीय : अफगानिस्तान में तालिबान के द्वितीय चरण का अभ्युदय

( राजेश कुमार सिंह )

तालिबान पश्तो भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ज्ञानार्थी ( छात्र) । ऐसे  छात्र जो इस्लामिक विचार धारा पर यकीन करते हैं। तालिबानी आंदोलन 1994 में दक्षिणि अफगानिस्तान से प्रारम्भ हुआ। वास्तव में यह सुन्नी आधारबादी आंदोलन था । इनके अधिकांश लोग पाक  मदरसों में शिक्षा ग्रहण किये थे। 1996 से 2001 तक यह अफगनिस्तान पर शासन करने लगे हां कुछ क्षेत्रों जैसे पंजशीर आदि इनकी अधीनता कभी स्वीकार नहीं किए । अमेरिका की 11 सितम्बर 2001 की घटना के बाद परिस्थितियों ने करवट लिया और ओसामा बिन लादेन के शरणगाह बनने के कारण अमेरिकी नेतृत्व में नाटो की सेनाओं ने इनका अधिपत्य समाप्त कर दिया ।

अमेरिका ने अरबो डॉलर खर्च किये और अफगानिस्तान में तीन लाख सैनिकों को प्रशिक्षित भी किया। भारत ने भी अफगानियों के हित मे वहां विभिन्न आधारभूत परियोजनाओं की झड़ी लगा दी और अफगानिस्तान विकास के पथ पर अग्रसर होने लगा। वहाँ की स्त्रियाँ – बच्चे खुले वातावरण में अपना कार्य करने लगे ।

बीस वर्ष के समय अंतराल के बाद अमेरिका अफगान से अपने सैनिकों को निकालने की योजना पर कार्य करने लगा। ट्रम्प प्रशासन ने फ़रवरी 2020 तालिबान से समझौता भी किया कि वह प्रत्यक्ष तालिबान पर हमला नही करेगा। अमरीका में सरकार बदली और जो बाइडेन के अनुसार ” हम अपनी सैनिकों की कितनी पीढ़ी अफगानिस्तान में छोड़ेंगे।” जो बाइडेन को उच्च सैन्य अधिकारियों ने चरणबद्ध वापसी एवं शीघ्रता न करने की सलाह दिए किन्तु उन्होंने वापसी हेतु  प्रारम्भ में 11 सितम्बर 2021 फिर इसको और आगे करते  हुए 30 अगस्त 2021 कर दिया गया। इस जल्दीबाजी ने अमेरिकन सैनिकों की क्रमिक वापसी को प्रभावित किया साथ ही अफगान आर्मी व तालिबान के मनोबल को भी बहुत प्रभावित किया फलस्वरूप तालिबान अपना विस्तार करने को और उद्दत हुआ और अफगान सेना का प्रतिरोध  कम हो गया। सीआईए के पूर्व अधिकारी और अमेरिका के पूर्व रक्षा मंत्री रह चुके रावर्ट  गेट्स ने 2014 में ही जो बाइडेन पर लिखा था कि ‘विगत चार दशकों से विदेश नीति व राष्ट्र के सुरक्षा सम्बन्धी बाइडेन का रुख बुरी तरह नाकाम साबित हुआ है। ‘अफगानिस्तान उसका तत्कालीन उदाहरण हो सकता है।

13 अगस्त 2021 से परिस्थितयां और तेजी से बदली और अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी यूएई के अबुधाबी में शरण हेतु 15 अगस्त 2021 को देश के नागरिकों को तालिबानियों की दया पर छोड़ पलायन कर गए। उनके अनुसार ” हम और खून खराबा न हो उससे बचने के लिए यह कदम उठाए हैं”।

तालिबान को अपने अभ्युदय के द्वितीय चरण में  अफ़ग़ानी सेना के अधिकारियों और जो बाइडेन की नीतियों के कारण बहुत ही कम प्रतिरोध का सामना करना पड़ा वह  तैंतीस प्रान्तों पर विजय पाकर अशफ गनी के निकलते ही काबुल में प्रवेश कर गया और अपनी सरकार की घोषणा की। 17 अगस्त 2021 को तालिबानी प्रवक्ता जबीहउल्ला मुजाहिद ने अपनी प्रेस कांफ्रेस में अपनी नीतियों की घोषणा की ,उनके अनुसार वह सभी को आम माफ़ी दे देंगे, विदेशी सरकारों से मान्यता हेतु सम्पर्क कर रहे हैं , महिलाओं को शरिया कानून के अनुसार रहना व अपना कार्य करना होगा, वह स्कूल और अपने कार्यालय शरिया नियमों का अनुपालन करते हुए जा सकती हैं। 19अगस्त 2021 को तालिबानी प्रवक्ता ने  इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान के गठन की घोषणा की साथ ही जल्द ही सरकार के गठन की घोषणा की बात की उनके अनुसार देश शरिया नियम से चलेगा ।किसी देश से व्यापार बन्द न करने की बात कही।

विदित हो कि तालिबान की कथनी और करनी में अंतर रहा है जो सम्प्रति दृश्टव्य है जहाँ अफगानिस्तान छोड़ने के लिए आतुर जनता को गोली खानी पड़ी रही है। वह पल कितना मार्मिक रहा होगा जब माताएं अपने शिशुओं को हवाई अड्डे पर बच्चे को दूसरों को सौंपते हुए किसी भी देश मे उसके सुरक्षित भविष्य हेतु अपने से दूर कर रहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिख रहीं हैं । महिला पायलट को पत्थर वर्षा कर उसका अंत किया जा रहा है। जलालाबाद की सड़कों पर अफगानिस्तानी झण्डा फहराने वालों पर गोलियां चलती हैं । 

तालिबान का अर्थशास्त्र फोर्ब्स के अनुसार मादक पदार्थों की तस्करी, फिरौती और लोगों  से मिलने वाला दान है । नाटो की खुपिया रिपोर्ट के अनुसार 2019-20 तालिबान के वार्षिक बजट 1.6 बिलियन डॉलर था जो फोर्ब्स के 2016 के आंकड़े से चार सौ गुना है अधिक है । 

 विश्व का सर्वाधिक अफ़ीम उत्पादन अफगानिस्तान  में होता है उसके एक चौथाई क्षेत्र पर तालिबान के कब्जा था। वह उत्पादक किसानों से फैक्ट्रियों में हेरोइन के उत्पादन व विपणन-व्यवसाय तक विभिन्न चरणों मे लगभग दस प्रतिशत की दर से टैक्स वसूलता, आयात – निर्यात भी करता और अपने को समृद्ध करते हुए इस स्थिति को प्राप्त किया। अमेरिकी सेना का मानना है कि इसकीं आमदनी का साठ प्रतिशत नशे के कारोबार से आता है।  अफगानिस्तान की अस्थिर स्थिति के कारण उसकी प्रचुर प्राकृतिक संपदा का सँगठित तरीक़े से दोहन नही हो सका है। यहाँ तांबा आदि धातुएं बहुतायत मात्रा में हैं जिनके असंगठित दोहन करने वाले क्षेत्रों में भी तालिबान टेक्स प्राप्त किया।

 प्रथम चरण के तालिबानियों के रहन -सहन  और सैन्य साजोसामान जो सामान्य दर्जे के थे वहीँ द्वितीय चरण में वह सभी क्षेत्रों परिष्कृत नज़र आता है । वह  खुशियों में नृत्य व पार्कों में मनोरंजन करता इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिखता है। विचारणीय प्रश्न है कि लगभग पचहत्तर हजार सैनिकों के बल पर तीन लाख अफगानी सैनिकों को परास्त किया गया । कथित रूप से कुछ अफगानी अधिकारी  कागज़ों पर कुछ सैनिक रखते थे और उससे जुड़े लाभ स्वयं लेते थे ।

पाकिस्तान ने सर्वप्रथम तालिबान सरकार का स्वागत किया, चीन और तुर्की और रूस जैसे देश को भी तालिबान से कोई परेशानी नही है ।चीन पहले से ही उनसे से वार्ता कर रहा था । उधर 33 प्रांतों पर कब्जे के बाद भी काबुल स्व 150 किमी दूर पंजशीर ने उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह के नेतृत्व में जो अफगानी कानून के अनुसार स्वयं को कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित कर दिए है ,पंजशीर के शेर कहे जाने वाले अहमद शाह मशूद कर बेटे और नादर्न एलायंस के नेता अहमद मसूद भी उनके साथ हैं ।

भारत ने अपने दो सैनिक सी -17 विमान के माध्यम से अपने 192 दूतावास कर्मियों को जिनमे भारत के अफगानिस्तान में तैनात राजदूत रूदेन्द्र टण्डन भी थे जामनगर होते हुए हिंडन एयर बेस पर सकुशल वापस लाया । वहीं फ्रांसीसी दूतावास की सुरक्षा कर्मियों को फ्रांस ने अपने साथ अपने माध्यम से काबुल से निकाला । 17 अगस्त 2021  को दिल्ली में सीसीएस की बैठक हुई जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह, अजित डोभाल, अफगानिस्तान में भारत के राजदूत रुदेन्द्र टण्डन एवं अन्य सम्बन्धित लोग सम्मिलित हुए । प्रधानमंत्री ने सभी भारतीय लोगों की सकुशल वापसी हेतु हरसम्भव प्रयास करने का आदेश दिया। साथ ही जो लोग वहां भारत की तरफ उम्मीद की नज़र से देख रहें हैं उनकी भी मदद करने को कहा ।भारत ने अपने बीजा नियमों में संसोधन कर अफगानी लोगों हेतु ऑन लाइन बीजा का आवेदन की मंजूरी दी । इस माध्यम से रहने वालों की वैधता छः माह की होगी । 20 अगस्त को सेना के सी -17 विमान द्वारा 290 भारतीयों एवं कुछ अफगानी लोगों के आने कि सम्भावना है हिंडन एयरबेस उनके आगमन के लिए तैयार है ,इसमे कुछ अफगानी सांसदों को होने की भी सम्भावना है देश मे अफगान सेल तेजी से काम कर रहा है वहां चार से पांच सौ भारतीयों के होने की सूचना मिल रही है ।

 

भारत अफगानिस्तान का शुभचिंतक रहा है अफगानी नागरिक भी भारत को अपना शुभचिंतक मानते रहे हैं । भारत अपने विदेशी राजनयन मे उसको काफ़ी महत्व देता रहा है। भारत इस समय यूएन सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष देश है। सार्क में बड़े भाई की भूमिका में वह हमेशा रहा है। अफगानी राजनैतिक स्थिति का सीधा प्रभाव भारत पर पड़ने वाला है । ऐसे में भारत की सक्रियता महत्वपूर्ण है वह  विभिन्न देशों के सम्पर्क में अपने विदेश मंत्री एस जयशंकर के नेतृत्व में निरन्तर बना हुआ है एवं प्रत्येक घटना पर नज़र गड़ाए हुए है । इस अति सम्वेदनशील मुद्दे पर भारत को वेट एंड वाच की नीति पर कार्य करना होगा  लेकिन जो दिख रहा है उसमें तालिबान को आतंकबादी ही माना जायेगा ,सभ्य समाज में बर्बरता वर्जित है। भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के अनुसार” आज पूरी दुनिया के सुरक्षा परिदृश्य में निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। बदली भूराजनैतिक स्थिति में, भारत  की सुरक्षा जटिल हुई हैं। हमारी सुरक्षा चिंताएं पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो गईं हैं । “

( लेखक राजेश कुमार सिंह मऊ जनपद के भावनपुर ,घोसी के निवासी हैं)

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