कहानी : जख्मी औरत

( अलका जैन, इंदौर मध्यप्रदेश )

जा बेटा एक ईंट ले आ कहीं से। बड़ी जोर से मारा है पुलिस ने। बड़ा दर्द हो रहा है। ईंट को गर्म कर के सिकाई करूंगा। दादा बोले, लड़का ईंट लेने चला गया।
तुम से कही थी पुलिस मार रही हैं मत जाओ, बेटा बोला।
अब हमने सोचा हमको काहे मारेगी पुलिस? हमने चोरी थोड़े किए है।
पर ये पुलिस मार काहे रही है बेटा?
बता रहे हे कोई छूत की बीमारी फैली है, मुन्ना बोला।
तो बीमारी क्या हमने फैलाई जो हमें मारा।
अब पुलिस से कौन पूछे।
कितने दिन तक बाहर नहीं निकल सकते?
पता नहीं, ऐसा पहली बार है।
तो अपने गांव वापस चलें।
कैसे जा सकते हैं? बस रेल सब सुनने में आया है कि बन्द है।
हमारी तो इतनी उम्र हो गई मगर ऐसा कभी ना तो देखा ना सुना।
झोपड़ी में आटा है?
हां है तो एक, दो दिन चल जायेगा।
फिर देखे क्या होता है। बाकी तो सब ठीक ही है मगर लुगाई की चिंता है। उस के पूरे दिन चल रहे हैं कभी भी बच्चा हो सकता है। बस रेल नहीं चलेंगी तो हम सब तो पैदल चल देंगे मगर औरत जात पेट से है उसका क्या करे?
वो जिस दाई के भरोसे आई
थी शहर, वो बोल रही है ये ही हाल रहा तो वो तो चली जाएगी।
तो जापा ( डिलेवरी)… कौन करेगा ?
औरते करवा लेगी। नानी है ना हरि की, वो झाबुइ से है। बोली मैं संभाल लूंगी, चलो ठीक है

शहर में अब काम नहीं मिलेगा।
क्या बोल रहा है तू हरि ?
काम नहीं तो रोटी कहा से खायेंगे ?
सब जा रहे है वापस अपने-अपने गांव।
पर हम तो नहीं जा सकते, बहू पेट से है। मुन्ना की मां बोली।
पैदल जाना पड़ेगा।
सब चले जायेंगे तो हमको भी जाना होगा। जापा ( डिलेवरी)…. कौन करायेगा।
हे भगवान।
मुन्ना बेबसी में भगवान को याद कर बैठा। कमला, मुन्ना की बीबी बोली मेरे से नहीं चला जायेगा।
बेटी चलना तो पड़ेगा, ससुर बोले।
देखो रास्ते में कोई ट्रक, ट्रेक्टर मिलेगा तो बैठ जायेंगे, तेरे को तो बिठा देंगे।
नहीं दादाजी कोई भी गाड़ी नहीं चल रही है, राम बोला।
अरे सब जा रहे हैं हमको भी जाना होगा। सामान बांध लो। कम से कम।
लूगाइयो। कभी भी जाना पड़ सकता है।
कमला बोली, मैं नहीं चल पाऊंगी।
यहां काम नहीं है क्या करें? रोटी तो पेट मांगता है। ससुर ने कहा। कमला का पति कुछ बोलने की हालत में नहीं था। सिर्फ एक टक जमीन को घूरता रहा। सब मेरे हो जाओ साथ में निकले।
कितने लोग हैं कुल ? किसी ने बस यूं ही पूछ लिया। पता नहीं अपने को तो गिनती आती नहीं।
भूरिया को आती है। भूरिया, भूरिया।
हां, हां साहब बोलो क्या बोल रहे हो।31 साल का लड़का बोला। तेरे को गिनती आती है ना? बता गिन के कितने आदमी है? पर साहब मेरे को तो बस दस तक ही गिनती आती है। पर मैं बता दूंगा, कितने दस है। चल बता, दादा बोले।
वाह साहब चार बार दस
ठीक है। तुम भी ना फालतु बात में लगे रहते हो, बीबी ने फटकार लगाई । दादा को। अच्छा अब दारू रख
लो रास्ते में बच्चा हो गया तो उसे दारू से नहलाना पड़ेगा बच्चे को।
दारू किसी के पास है क्या? भोले के पास होगी मगर वो देगा नहीं।
अरे बाबा में भी इंसान हूं। मैं दे दूंगा। भोला ने पहली बार समझदारी की बात कही है। सब हंस दिये।
सब निकल पड़े खूल्ली सड़क पे अपना सीना ताने। किसी के पास चप्पल हैं किसी के पास नहीं भी है।
पर चिंता सब के पास है आगे कैसे जीवन चलेगा। गर्भवती महिला की चिंता की कोई सीमा नहीं है। पेट में 09 महिने का बच्चा पल रहा है खुद के खाने को नहीं है और कोई पेट में पल रहा है। रास्ते लम्बे है और जापे ( डिलेवरी)… का समय नजदीक। सर पर आदमी हो या औरत सब अपने सामान को रखें है। पैर में छाले पड़ गये है मगर सफर अभी बाकी है लम्बा। सर पर बोझ और पेट में भूख है। जीवन चलने का नाम चलते रहो सुबह-शाम जैसे ये गीत इन मजदूरों के लिए ही लिखा हो। कोऱोना महामारी ने बुरा हाल कर
दिया। आदमी आगे आगे औरत पीछे पीछे। फिर आदमी ने देखा औरतें तो बहुत पिछे है। अरे औरतें कहा रह गई? किसी ने कहा सूचना दे कर।
तभी कमला के आदमी ने घबराकर कहा कहीं मेरी लुगाई को दर्द तो नहीं उठने लगा। ये चिंता मत कर दोस्त सब ठीक करेंगे भगवान। जा रामू देख कर आ औरतो को।
अरे बच्चे को मत भेजो, कमला के आदमी को भेजो। हां मै‌ देखकर आता हू। अरे शाम पेट से है कमला उसको किस ने कुछ खाने को दिया क्या? हां काका के पास चार आलू ‌निकले थे कच्चे वहीं दे दिये थे बाई तो कच्चे आलू ही खां गई। चलो पेट में कुछ गया तो। बाबा औरतें चंद्दर मांग रही है। साहब। क्या?
अरे बच्चा होने वाला है आड़ करनी होगी। हां वो तो है। काका।
दादा काकी तो चिखे ही जा रही है
बेटा तू क्या जाने औरत होना आसान नहीं होता बेटा। अपने तो आदमी हैं। औरत का दर्द आज ही जाना बाबू।
रोने की आवाज आई लगता है हो गया बच्चा। हां काका है। क्या हुआ कमला को ? लड़का । सब मिलकर ताली बजाएं ये। सब ताली बजा दिये।सारे मजदूर जो आपने छाले पैर के देख लो रहे थे खुशी से झूम उठे। दादा जी दादी पगड़ी मंगा रही है। दादा की पगड़ी दादी मांग रही है। काका बोले उठा। अरे औरतें के साथ स़ो‌ नाटक होते हैं खून साफ करना होगा। दे दो दादाजी। अरे बाप बन गया फिर भी खुश नजर नही आ रहा?
कैसे खुश होऊं काका औरत ने मेरे बच्चा जना ओर कुछ खाने लाने का नही है। उपर से अभी अपना गांव बहुत दूर है। अभी बहुत चलना है।
कमला ने बात सुनकर कहूं अरे अपने मजदूरों के घर में ये पहली बार तो नहीं कि खाने को नही है कुछ। मेरा बच्चा हो गया मैं तो खुश हूं।
पहले ही गरीब की किस्तम में गम कम नहीं थे उपर से ये महामारी कोरोना है भगवान रहम कर। किसी के पास कुछ हो तो कमला को दे दो। किसी के पास कुछ नहीं है। हम इतने सारे मर्द और एक औरत को ख़ाना नही खिला पा रहे है। चार बार, दस लोग। इतने लोग। आज पहली बार हुआ कि सारे आदमी रोये एक औरत के दर्द में। नवजात शिशु को उठाया कमला ने ओर चल पडी भूखी। सफर अभी बाकी है जारी है। औरत जख्मी है मगर उसे कहा दिख रहे हैं अपने जख्म। औरत तो बच्चा देख रही है। औरतें कब देखती हैं अपना जख्म। जख्मी हर औरत होती है। सफर जारी है, पथ पर औरत के पैर के निशान बनते जा रहे हैं खून भरे पैरों के निशान।

अलका जैन, इंदौर मध्यप्रदेश
जन्म 08-10-1957
बीएससी
दूरदर्शन और आकाशवाणी में कविता पाठ, गोल्डन बुक औफ वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर, कोमेडियन

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